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Photo Caption: Ayodhya Samachar :: Photo Grapher : Ayodhya Samachar
फैजाबाद। टूटन की बुनियाद पर मजबूत इमारत का सपना देश में 68 साल से देखा और दिखाया जा रहा है। देश टूटा, प्रांत टूटा, जिला टूटे, तहसीलें टूटी, ब्लाक टूटे, गांव टूटे, संयुक्त परिवार टूटे, परिवार टूटे और आज हालत यह है कि व्यक्ति टूट रहा है। संस्कृति टूटे, संस्कार टूटे, सरोकार टूटे, सदाचार टूटा और आज व्यवहार टूट रहा है। 
यह माना गया है कि आवश्यकता है अविष्कार की जननी है इसलिए बदलाब के लिए टूटना जरूरी है। नव निर्माण के लिए भौगोलिक सीमाओं में बदलाव आएगा ही। लेकिन सहमति व असहमति की टूटन कर्म तो आम लोग भी घर परिवार में भी देख सकत है। 
इतिहास के जानकार भली भांति जानते है कि देश की आजादी के लिए हिन्दुस्तान और पकिस्तान का बटंवारा होने जैसी अंग्रेजों की शर्त से गांधी जी व उनके कट्टर अनुयायी डा. राम मनोहर लोहिया, बाबू जय प्रकाश नारायण आदि सहमत नहीं थे। पं. जवाहर लाल नेहरू द्वारा यह शर्त मान लेने से मिली आजादी के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को जब दिल्ली में आजदी का जश्न मनाया जा रहा था तो गांधी जी उसमें शरीक नही थें। गांधी जी हिन्दू-मुस्लिम के बीच कलकत्ता में उपजी तख्खी कम कराने का जतन करने में जुडे थे। बोलचाल में अक्सर एक वाक्य इस्तेमाल होता है ‘‘ डिवाइड एण्ड रूल’’ (बांटो और राजकरों) यह नीति अंग्रेजों की देनै है। कालान्तर में सियासी दलों ने भी इस नीति पर अमल करना शुरू किया। 1967 में राजनीतिक दलों में टूटन की शुरूवात हुई। इसके बाद प्रांतों के टूटने बारी आयी। फिर राजनीतिक स्वार्थ के लिए ही जिला / तहसील / ब्लाक व गांव के टूटने का सिलसिला शुरू हुआ। हर टूटन को मजबूती का आधार बताया गया। लेकिन जो नख्श उभरे और परिणाम सामने आए वे टूटन का ही संदेश बिखेरने वाले रहे।
थोपी गयी आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभाव के कारण संयुक्त परिवार टूटने लगे। इन्ही कारणों से परिवार टूटे और इन्ही कारणों से अब व्यक्ति टूट रहा है। समझौता और तसल्ली की कार्य संस्कृति तथा व्यवहार ने इन्सान के सामने मजबूरी से हालत पैदा कर दिए। मजबूरियों के नाते ही व्यक्ति थोेपे जा रहे व्यवहारों से टूट रहा है। नई पीढी उद्दंड, आचार, विचार और व्यवहार से मनमानी की पोषक बन गयी है। बडों के लिए पाल्योंकी यही मनमानी बेबसी का सबब है। मजबूरी, बेबसी से कुठा ग्रस्त हालत में जीवन बिता रहा बहुतायत जन टूटता जा रहा है। यह अलग बात है कि सामाजिक कारणों से बहुतायम लोग चैखट के अंदर जीवन का यह दंश झेल रहे है जब कि चैखट के बाहर भी इस पीडा के शिकार लोगों की तादाद कम नही है। टूटते बनते राजनीतिक दल बार-बार मजबूती का दावा करते रहे है। यही हाल केन्द्र व प्रदेश सरकारों का रहा। 

लेकिन नतीजा इसी कहावत ’’ मर्ज बढता गया ज्यौं-ज्यौं दवा किया’’ जैसा रहा। 

बड़ो द्वारा अपने आचार विचार और व्यवहार के समाजिकता में पिरोए गये उस संस्कारों का क्रमशः बढ़ता गया संक्रमा सामाजिकता में घुली लगभग हर समस्या की देन बना। सभी जानते है संस्कार पानी के प्रवाह की तरह बढ़ता है। जिस तरह पानी को उचाई पर गिरा दिया जाय तो वह जमीन तक गिरने का रास्ता बना लेता है उसी तरह बड़ो के कृत्य व कृत्यों की उपज नीचे तक पहुंच जाती है। जब कि पानी को नीचे से ऊपर लेजाने के लिए ताकत का सहारा लेना पड़ता है । यह ताकत मोटर की हो या मैन पावन की। संस्करों की दिनों दिन बढ़ती गयी कंगाली से सरोकरों के प्रवाह में अवरोध आता गया। हम और हमारे से मैं और मेरे तक पहुंचे आम सरोकारों की आंच में अब मैं भी तप रहा है। समय रहते सुसंस्कारों के विकास पर ध्यान न दिया गया तो किसी समस्या का निदान दिवा स्वपन सा ही साबित होगा। 

सरोकरों में आयी दरार भरने के जतन और व्यवहार में कर्तव्य बोध की शैली विकसित न की गयी तो कुरूप होती चल रही सामाजिकता की शक्त भबिष्य में भयावह और डरावनी होती जाएगी।