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Photo Caption: Clipart :: Photo Grapher : Ayodhya Samachar

धर्म के असल मायनों से मुंह मोडे है अनेक धर्मगुरू

रमेश शर्मा, स्‍वतंत्र पत्रकार

धर्म निरपेक्षता, सेकुलर, साम्प्रदायिक आदि शब्दों का राजनीति व सामाजिकता में गलत उपयोग हो रहा है। जब कि यह दावा किया जाता है कि धर्म निरपेक्ष है तो साधारणतया सहज रूप में उसे लोग यह मानते है कि दावा करने वाले का कोेई धर्म नही मानता अथवा अधर्मी है। यदि ऐसा नही भी सोचतें तो सेकुलर होने या धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वालों पर उनके विपक्षी बोलचाल के अंदाज से उन्हें अधर्मी साबित करने में जुट जाते है। इसी के साथ धर्मनिरपेक्ष होने का दावा करने वालों द्वारा दूसरे पर साम्प्रदायिक होने का आरोप मढनें पर आरोपी की स्थिति किसी वर्ग विशेष में भले असहज होपर बहुतायत लोगों की हमदर्दी स्वतः उससे हो जाती है। बोलचाल के तथा समझ के अनाडीपन ने मौजूदा समय सामाजिकता को दो खांचे में बांटकर रख दिया है। जबकि असलियत यह है कि कोई भी इंसान धर्मनिरपेक्ष नही हो सकता । 
दरअसल संविधान में प्रयुक्त शब्द ‘‘सेकुलर’’ का शाब्दिक अर्थ सियासी जमात ने मनमाने ढन से गढ लिया है। संविधान में सेकुलर शब्द का प्रयोग जिन संदर्भों में हुआ है उसके निहितार्थ अलग है। उस सेकुलर शब्द का निहितार्थ यह है कि देश का संविधान किसी धर्म या मजहब के प्रति एकांगी होने के बजाय सर्वधर्म समभाव का नजरिया अपनाएगा। लेकिन सियासी जमात के लोगों ने सोची समझी साजिश के तहत सेकुलर शब्द के मायने और निहितार्थ अपने हिसाब से गढ लिए और अपने अनुयायियों पर थोप दिए। वैचारिक दरिद्रता और संास्कारिक कंगाली झेल रही मौजूदा पीढी भेडचाल का रूख किए न केवल शब्द बोलती चल रही है बल्कि इसके कुप्रभाव भी छोड़ती चल रही है।
सेकुलर शब्द के राजनितिक और सामाजिक स्तर पर प्रचलित मायने का मरम प्राख्यात मनीषी डा राम मनोहर लोहिया ने समझा था। इसीलिए वे सर्वधम समभाव की बात किया करते थे। पर मौजूदा समय उनके अनुयायी ही डा लोहिया की व्याख्या वाले शब्द की जगह धर्म निरपेक्ष शब्द का ही इस्तेमाल करते हैं अंदर की बात वही जानें पर जाहिरा तौर पर बोचचाल के प्रचलन में धर्मनिरपेक्ष होने की दावेदारी ही उन्हें नुक्सान पहुंचा रही है। क्योकि खुद को धर्मनिरपेक्ष बता दूसरे को धर्म के आधार पर ही साम्प्रदायिक कहने की रट के नाते क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप कथित धर्म निरपेक्ष लोगों को जनसामान्य में आसानी से अधर्मी साबित कर ले जाते है। 
सियासत की असलियत यह है कि कम्यूनिस्ट पार्टी के पुरोधा माने गये ए.पी. गंगे व नम्बूतरी जैसे लोग मा काली के घोर उपासक थे। ठीक इसके उलट धर्मिक होने का दम्भ भरने वालें सगठन आरएसएस के बहुतायत प्रचारक व बडे ओहदे दार पूजा पाठ से कोसों दूर है। कई मुस्लिम संगठनों के बडे नेता पांचो वक्त के नमाजी नही है कुछ तो रोजा भी नही रखते। आदि शक्ति मां भगवती के विभिन्न स्वरूपों की पूजा, राम, कृष्ण और शिव की या उनके विभिन्न रूपों का मंदिर बनाकर पूजा-पाठ का दम्भ भरने वाले अनेक धर्मगुरू खुद पूजा अर्चना नही करते बल्कि विग्रह की पूजा का दायित्व पुजारी पर है।
धर्म-अधर्म की इन्ही उलझाव भरी परिस्थितियों के कारण सामाजिकता के बिगड़ते माहौल का आभाव डा राम मनोहर लोहिया को अब से पांच दशक पहले हो गया था। 1962 से ही वे देश मंे धूम-धूम कर भविष्य के खतरे के प्रति लोगों को आगाह किया करते रहते थे। वे कहा करते थे ‘‘ धर्म अल्पकालिक राजनिति है और राजनिति दीर्घकालीन धर्म ’’ धर्म का काम है मानवीय संबंधों में अचछाई स्थापित करे और राजनिति का काम है बुराई से लडे। धर्म जब मानवीय संबंधों में अच्छाई स्थापित नही करता और स्तुति तक सीतिम हो जाता है तो निष्प्राण हो जाता है और राजनीति जब बुराई से नही लड़ती तो वह कलही हो जाती है।
डा लोहिया उस जमानें में ही महसूस करते थे कि आगे चलकर सेकुलर और साम्प्रदायिक शब्दों के क्या मायने गढ़े जायेगे। इसीलिए वह सर्वधर्म-समभाव की बात करते थे। वे कहा करते थे कि धार्मिकता हो या सामाजिकता निजता का दायरा चैखट के भीतर है। चैखट के बाहर व्यक्ति एक सामाजिक प्राणी हो जाता है। चैखट के बाहर व्यक्ति को सभी से समन्वय बैठाना पडता है। बाजार हो या दफ्तर विभिन्न वर्ग के, पंथ के, धर्म के , मजहब के लोग इकठ्ठा होते है। ऐसे में सर्वधर्म समभाव के जारिए ही आपसी एकता मजबूत रह सकती है। खासकर हिन्दू-मुसलमानो कें बीच गढ़े गए शब्दों के कारण ही बढनें वाली दूरी का अहसास उन भविष्य दृष्टा को भली-भातिं था। वह कहा करते थे कि हिन्दूओं को यह बात समझनी चाहिए कि रजिया, रसखान, जायसी आदि मुसलमान नही उनके पुरखें थे साथ ही मुसलमानों को यह मानना चाहिए कि गोरी, गजनी और बाबर उनके पुरखे नही हमलावर थे।
राजनीति क्षेत्र में जो लोग भी अपने को सेकुलर होने की रट लगाकर वर्ग विशेष में ‘‘धर्म को न मानने वाला साबित करने में लगे रहते है वे अपना नुक्सान ही करते चल रहे है। क्योकि ऐसा कहने कहलाने वाले विग्रह पूजन के साथ पूजा पाठ करते है धर्म को मानते है। समय-समय पर धार्मिक आयोजनों में उनकी सार्वजनिक रूप से शिरकत रहती है पर सेकुलर शब्द की रट के कारण उनका नुकसान होता है।
वास्तविकता यह है कि व्यक्ति कोई न कोई धर्म स्वीकार जरूर करता है अन्यथा की स्थिति में वह अधर्मी, अत्यायी और आततायी हो जाएगा, निरंकुश होकर कदाचारी और दुराचारी हो जाएगा। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौध, पारसी, कबीरपंथी आदि प्रचलित नामों के अलावा भी मातृधर्म, पितृधर्म, भ्राताधर्म, पुत्रधर्म, पारिवारिक धर्म , सामाजिक धर्म आदि विभिन्न प्रकार के धर्म के बंधनों में से किसी न किसी बंधन की जकड़ में व्यक्ति रहता जरूर है। पर राजनीतिक स्वार्थ वश अधर्मी होने का ढ़ोग उसी पर भारी पड़ता है।
अगर ईमानदारी से आंकलन किया जाय तो आज बहुत से धर्म गुरू अपनी वास्तविक जिम्मेदारियों से विमुख है। मानवीय संबंधों में अच्छाई स्थापित करने के बजाय तल्खी बढ़ाने में लगे है। कराह रही इंसानियत की खिदमत की ओर से मुह मोडे है, पाखंड और स्तुति को मात्र को ही धर्म मानकर कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे है यही चलन सामाजिकता में जहर घोलता चल रहा है।