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Photo Caption: Clipart :: Photo Grapher : Ayodhya Samachar

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उनकी कृति ‘‘जिक्रे दौरा की गजल

धज्जियां उड़ने लगी इख्लास की, ईमान की
फिक्र अब कोई नहीं इन्सानियत की जान की
 फिरकों और जातों पे है अब तो सियासत का करम
कद्रें इन्सानी कहां! घातें है ये शैतान की
 इस तरह शेरो अदब के जौक का फुकदान है 
थैलियां बनने लगी अब सफ-ए-दीवान की
 ये है गर दौरे तरक्की तो जरा बतलाइये
 बिन कफन लाशों पड़ी है आज क्यों इन्सान की
 क्यांे न तर हो जाय आमिल चश्म इन हालात पर 
हक-परस्ती पर भी है खामोशियों इन्सान की।